
दो ध्रुवों के बीच का सच
भारत के इतिहास में मुगल काल और हिंदू मंदिरों के बीच के रिश्ते को अक्सर दो चरम सीमाओं में देखा जाता रहा है, या तो पूरी तरह से सहिष्णुता (यानी मुगल बहुत अच्छे थे) या फिर व्यवस्थित तोड़फोड़ (यानी मुगल सिर्फ मंदिर तोड़ते थे)। ये दोनों ही बातें अधूरी और एकतरफा हैं। यह निबंध असली ऐतिहासिक दस्तावेजों और मंदिरों की दीवारों पर लिखे शिलालेखों के आधार पर यह साबित करेगा कि मुगल राज्य असल में धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) और बहु-धार्मिक था।
इस पूरी कहानी को समझने के लिए वृंदावन सबसे अच्छी जगह है। कृष्ण भक्ति का यह प्रमुख केंद्र किसी बहुत पुराने ज़माने में नहीं बल्कि मुगल काल के दौरान ही विकसित हुआ। वृंदावन के श्री श्रीवत्स गोस्वामी जैसे विद्वानों ने यहाँ प्रेम (दिव्य प्रेम) की एक ऐसी विचारधारा विकसित की जिसमें ईश्वर और इस दुनिया के बीच कोई फर्क नहीं है। मजेदार बात यह है कि इन मंदिरों को बनवाने के लिए मुस्लिम बादशाहों के सहयोग की जरूरत पड़ी।
यह निबंध चार भागों में बंटा है। पहले, हम मुगल धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा सुल्ह-ए-कुल को समझेंगे। दूसरे, अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के ज़माने में मंदिरों को मिले अनुदानों के दस्तावेज देखेंगे। तीसरे, औरंगज़ेब के पेचीदा लेकिन पुख्ता इतिहास को समझेंगे। चौथे, देखेंगे कि ये मंदिर अनुदान आम लोगों के जीवन से कैसे जुड़े थे।
वृंदावन के दस्तावेज़ों की खोज और श्री श्रीवत्स गोस्वामी की भूमिका
वृंदावन के जो दस्तावेज़ आज हमारे पास हैं, उन्हें सदियों तक चैतन्य गोस्वामियों ने संभालकर रखा था। इनमें मुगल बादशाहों के फरमान, जमीन के दान-पत्र, और जमीन की बिक्री के रिकॉर्ड शामिल हैं। ये दस्तावेज़ हमें मुगल काल के आम लोगों की ज़िंदगी की एक अनोखी झलक देते हैं।
सन् 1970 के दशक में लंदन के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ के प्रोफेसर तारापद मुखर्जी (1928-1990) ने वृंदावन-मथुरा क्षेत्र में चैतन्य गोस्वामियों और उनके मंदिरों के पास जो पुराने दस्तावेज़ थे, उन्हें इकट्ठा करना शुरू किया। इस काम में वृंदावन के प्रसिद्ध विद्वान और संत श्री श्रीवत्स गोस्वामी ने बहुत महत्वपूर्ण मदद की। इरफान हबीब ने खुद बार-बार स्वीकार किया है कि श्रीवत्स गोस्वामी के बहुमूल्य सहयोग के बिना यह संग्रह इतना बड़ा नहीं हो पाता।
20 अक्टूबर 1986 को तारापद मुखर्जी ने हबीब को पत्र लिखकर प्रस्ताव रखा कि वे दोनों मिलकर फारसी भाषा के इन दस्तावेज़ों पर काम करें। श्रीवत्स गोस्वामी के सहयोग से यह संग्रह और बढ़ता गया। 1987 और 1989-90 में हबीब और मुखर्जी ने तीन बहुत महत्वपूर्ण शोध-पत्र प्रकाशित किए, जिनमें अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के ज़माने में गोस्वामियों से मुगलों के संबंधों की पड़ताल की गई।
दुर्भाग्य से, 7 जुलाई 1990 को तारापद मुखर्जी का निधन हो गया। लेकिन हबीब ने काम जारी रखा। उन्होंने दस्तावेज़ों को पढ़ा, उनकी नकल उतारी, उन्हें क्रमांक दिया, उनका विश्लेषण किया और उन पर किताबें लिखीं। ये दस्तावेज़ ज्यादातर फारसी भाषा की शिकस्ता लिपि में लिखे हैं , जो बहुत मुश्किल और टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट होती है। हबीब को इस लिपि को पढ़ने में महारत हासिल थी, इसलिए वे असली दस्तावेज़ों को नकली से अलग कर सके।
आज ये मूल दस्तावेज़ वृंदावन में श्री श्रीवत्स गोस्वामी द्वारा संचालित संस्थान, श्री चैतन्य प्रेम संस्थान, में रखे हुए हैं। इसके अलावा, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एडवांस स्टडी के पुस्तकालय में भी इन दस्तावेज़ों की प्रतियाँ मौजूद हैं।
श्री श्रीवत्स गोस्वामी (जन्म 27 अक्टूबर 1950) सिर्फ एक धार्मिक नेता ही नहीं हैं, बल्कि एक प्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट (भारत-विद्या के विशेषज्ञ) भी हैं। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में पढ़ाई की है और हार्वर्ड विश्वविद्यालय में विजिटिंग स्कॉलर रहे हैं। वे ‘रिलीजन्स फॉर पीस’ (धर्म शांति के लिए) संस्था के मानद अध्यक्ष हैं। उनकी बदौलत ही ये कीमती दस्तावेज़ इतिहासकारों तक पहुँच पाए।
मुगल धर्मनिरपेक्षता की नींव: सुल्ह-ए-कुल
मुगल बादशाहों का सभी धर्मों के प्रति तटस्थ रवैया कोई दिखावा नहीं था, बल्कि यह एक पक्की विचारधारा थी। अकबर (1556-1605) के ज़माने में सुल्ह-ए-कुल यानी “सबसे शांति” या “पूर्ण शांति” की नीति को राज्य का आधार बनाया गया।
अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि मुगल बादशाह सभी धार्मिक और जातीय समूहों से ऊपर होता है। वह उन सबके बीच न्याय करता है और हर किसी की इज्जत और आस्था की रक्षा करता है। सुल्ह-ए-कुल का यह सिद्धांत सभी धर्मों को अपनी बात कहने की आज़ादी देता था, बशर्ते वे राज्य के खिलाफ न जाएं या आपस में न लड़ें।
यह सिर्फ बातें नहीं थीं, बल्कि ठोस कदम भी उठाए गए:
· अकबर ने 1563 में तीर्थ-कर और 1564 में जज़िया (गैर-मुसलमानों पर लगने वाला टैक्स) खत्म कर दिया।
· उसने अपने अफसरों को आदेश दिए कि वे सुल्ह-ए-कुल के सिद्धांत पर चलते हुए सबके साथ एक जैसा व्यवहार करें।
· प्रोफेसर शिरीन मूसवी के अनुसार, “अकबर ने मथुरा से आगरा तक अज्ञात वेश में यात्रा की और यह देखा कि किसी व्यक्ति पर तीर्थयात्रा करने पर टैक्स लगाना उचित नहीं है। लौटकर उसने यह कर खत्म कर दिया।”
· अकबर ने सिंहासन बत्तीसी, अथर्ववेद, महाभारत, हरिवंश और अन्य धर्मग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया। यह सिर्फ राजनीति नहीं थी, बल्कि दूसरे धर्मों को समझने की एक ईमानदार कोशिश थी।
इस नीति का नतीजा यह हुआ कि मुगल दरबार में ईरानी, तुरानी, अफगान, राजपूत और दक्कनी, सभी को सिर्फ उनकी काबिलियत के आधार पर नौकरी और इनाम मिलते थे, उनके धर्म को देखकर नहीं।
अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के मंदिर अनुदान
वृंदावन के दस्तावेज़ साफ तौर पर बताते हैं कि मुगल बादशाहों ने मंदिरों को अनुदान देने की व्यवस्था बना रखी थी। अकबर ने मथुरा क्षेत्र के 35 मंदिरों और उनके सेवकों के लिए अनुदानों को बढ़ाया और उन्हें पक्का किया।
लेकिन सबसे अहम बात यह है कि यह सिलसिला अकबर के बाद भी जारी रहा। दस्तावेज़ बताते हैं:
“जहांगीर ने न सिर्फ इन अनुदानों को जारी रखा, बल्कि उनमें खूब इजाफा भी किया। उसने अकबर के 35 मंदिरों की सूची में कम से कम दो नए मंदिर जोड़े। इसके अलावा, उसने मंदिर सेवकों के पांच परिवारों के लिए 121 बीघा ज़मीन दी। जहांगीर ने 1620 में वृंदावन के मंदिर का दौरा भी किया।”
इस बात की एक और पुष्टि एक शाही फरमान से होती है जो जहांगीर के 16वें राज्य वर्ष (1621 ईस्वी) में जारी हुआ था। यह फरमान आज राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में मौजूद है। इस फरमान में आदेश दिया गया है कि अंकपाड़ नामक स्थान पर एक मंदिर के पुजारियों को 50 बीघा ज़मीन मिलती रहेगी। फरमान में साफ लिखा है कि यह ज़मीन पहले उनके दिवंगत पिता (अकबर) ने दी थी, और अब यह जारी रहेगी। फरमान में स्थानीय अफसरों (चौधरी, कानूनगो, मुकद्दम) को आदेश दिया गया है कि वे पुजारियों को परेशान न करें और उन्हें हमेशा के लिए शांति से रहने दें।
इस तरह के फरमान दिखाते हैं कि मुगल राज्य नियमित रूप से सब धर्मों के धार्मिक संस्थानों को संरक्षण देता था। यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि रोज का काम था।
शाहजहाँ के ज़माने में भी यह परंपरा जारी रही। उसे अक्सर ज्यादा रूढ़िवादी माना जाता है, फिर भी दस्तावेज़ बताते हैं कि “शाहजहाँ और औरंगज़ेब के शासनकाल में युद्ध में नष्ट हुए कई मंदिरों की मरम्मत के लिए अनुदान जारी किए गए।”
औरंगज़ेब: पेचीदा मगर पुख्ता इतिहास
औरंगज़ेब (1658-1707) का शासनकाल अक्सर मुगल धर्मनिरपेक्षता में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाता है। उसने 1679 में फिर से जज़िया कर लगाया। उसने विद्रोही इलाकों में कई मंदिर भी तोड़े। ये बातें सच हैं। लेकिन क्या सिर्फ यही पूरी कहानी है? नहीं। दस्तावेज़ और शिलालेख कुछ और भी बताते हैं।
युद्ध में नष्ट हुए मंदिरों की मरम्मत के लिए अनुदान देने की नीति औरंगज़ेब के ज़माने में भी जारी रही। इससे भी बढ़कर, कई मंदिरों की दीवारों पर लगे शिलालेख खुद औरंगज़ेब के अनुदानों की गवाही देते हैं।
प्रयागराज के इतिहासकार प्रदीप केशरवानी ने सोमेश्वर महादेव मंदिर (अरैल, इलाहाबाद) का अध्ययन किया है। इस मंदिर के एक स्तंभ पर संस्कृत में 15 वाक्य लिखे हैं। इनमें कहा गया है:
“देश के शासक ने 1674 में मंदिर का दौरा किया और मंदिर को ज़मीन और धन का भारी अनुदान दिया।” (यह शिलालेख आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है, हालाँकि भक्तों द्वारा बार-बार सिंदूर लगाने से यह थोड़ा मिट गया है।)
एक और बहुत बड़ी गवाही भारत की संसद (राज्यसभा) में दर्ज है। 27 जुलाई 1977 को तत्कालीन इलाहाबाद मेयर विशंभर नाथ पांडे (जो बाद में उड़ीसा के राज्यपाल बने) ने सदन को बताया कि उनके सामने एक मंदिर का विवाद आया था। एक पक्ष ने औरंगज़ेब के अनुदानों के दस्तावेज़ पेश किए। यह मामला जस्टिस टी.बी. सप्रू की अध्यक्षता वाली एक समिति को भेजा गया। इस समिति ने उन सभी मंदिरों से दस्तावेज़ माँगे जिन्होंने औरंगज़ेब से ज़मीन या पैसे के अनुदान लिए थे। पांडे ने बताया:
“कई मंदिरों, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, चित्रकूट का बालाजी मंदिर, गुवाहाटी का उमानंद मंदिर, संरजय के जैन मंदिर और दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों, ने समिति के सामने ऐसे दस्तावेज़ पेश किए।”
प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने इस बारे में एक संतुलित राय दी है। उनके अनुसार, “अकबर ने भी मंदिर को अनुदान दिया था ताकि लोग देखें कि वह सबका शासक है। सोमेश्वर महादेव मंदिर के मामले में, औरंगज़ेब ने शायद अनुदान बढ़ा भी दिया था।”
इसका मतलब यह नहीं है कि औरंगज़ेब बिल्कुल अच्छा था या बुरा था। इसका मतलब यह है कि वह एक सम्राट था, और उसका मुख्य लक्ष्य राज्य चलाना था। उसने कभी मंदिर तोड़े, यह आमतौर पर उन इलाकों में हुआ जहाँ विद्रोह हुआ था या सत्ता के खिलाफ कोई चुनौती थी। और कभी उसने मंदिरों को अनुदान दिए, यह उन इलाकों में हुआ जहाँ शांति थी और मुगल सत्ता को समर्थन की जरूरत थी। दोनों ही उसके राज्य चलाने के एक ही उपकरण थे।
मंदिर अनुदान के पीछे का समाज
ये दस्तावेज़ सिर्फ बादशाहों की नीतियाँ नहीं बताते, बल्कि उस ज़माने के आम लोगों की ज़िंदगी का भी बड़ा खुलासा करते हैं। दस्तावेज़ों से पता चलता है कि हिंदू-मुस्लिम धार्मिक तनाव मुगलकालीन ब्रजभूम की कोई बड़ी विशेषता नहीं थी।
औरंगज़ेब के ज़माने में भी, 1704 में आगरा के गवर्नर मुख्तार खान ने 18 परगनों के हर गाँव से एक रुपया इकट्ठा करके वृंदावन के गोविंद देव मंदिर के मुख्य पुजारी को देने का आदेश दिया, यह राशि करीब 2,000 रुपये सालाना बनती थी।
दस्तावेज़ों में रोज़मर्रा की सह-अस्तित्व की तस्वीर बड़ी साफ दिखती है:
· वृंदावन-मथुरा क्षेत्र में मुस्लिम फकीर भी रहते थे।
· गोस्वामी हिंदू और मुस्लिम, दोनों भिखारियों को खाना खिलाते थे।
· गैर-मुसलमान अपने जमीनी दस्तावेज़ दर्ज कराने के लिए काज़ी (मुस्लिम जज) की अदालतों पर निर्भर थे।
· हिंदू पत्र लेखक अपने पत्रों में “अल्लाहु अकबर” और “जज़ाकल्लाह” जैसे इस्लामी शब्दों का इस्तेमाल करते थे।
· मुस्लिम लोग गाँव की पंचायतों (पंच) में शामिल थे।
· मुस्लिम लोग गैर-मुसलमानों के लिए जमीन बेचने वाले और गवाह बनने का काम भी करते थे।
जब भी कोई झगड़ा होता था, तो वह आमतौर पर हिंदू-मुस्लिम के बीच नहीं होता था। बल्कि झगड़े दो गोस्वामी परिवारों के बीच होते थे, या फिर गोस्वामियों और दूसरे वैष्णव संप्रदायों (जैसे राधा-वल्लभी, हरिदासी, रामानंदी) के बीच होते थे। और इन झगड़ों को सुलझाने के लिए दोनों पक्ष मुगल अधिकारियों के पास जाते थे। यह बता देता है कि वे मुगल राज्य को एक निष्पक्ष और सही मध्यस्थ मानते थे।
दस्तावेज़ यह भी दिखाते हैं कि गोस्वामी अपने छोटे-मोटे लेन-देन को भी फारसी भाषा में लिखवाने की जल्दी करते थे। उन्हें पता था कि मुगल राज्य उनकी जमीन के हक की रक्षा करेगा। यही सबसे बड़ा सबूत है कि वे मुगल राज्य पर भरोसा करते थे।
मुगल राज्य का धर्मनिरपेक्ष चरित्र
वृंदावन के ये दस्तावेज़, जिन्हें श्री श्रीवत्स गोस्वामी ने सदियों तक संरक्षित रखा, और जिनका गहन अध्ययन हबीब और मुखर्जी ने किया, साफ साबित करते हैं कि मुगल राज्य धर्मनिरपेक्ष था। यहाँ धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है कि वे धर्म के खिलाफ थे। बल्कि मतलब यह है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ और निष्पक्ष था।
अकबर से लेकर औरंगज़ेब तक, यह नीति लगातार जारी रही। सुल्ह-ए-कुल की यह विचारधारा किसी एक बादशाह की निजी सोच नहीं थी, बल्कि मुगल राज्य का एक स्थायी और पक्का सिद्धांत था। यहाँ तक कि औरंगज़ेब, जो अपने निजी जीवन में ज्यादा रूढ़िवादी था, ने भी कई मंदिरों को ज़मीन और पैसे दिए। और उन मंदिरों के पुजारियों ने इन अनुदानों को सदियों तक संभालकर रखा।
आज भी, ये मूल दस्तावेज़ वृंदावन में श्री श्रीवत्स गोस्वामी जी के संस्थान (श्री चैतन्य प्रेम संस्थान) में सुरक्षित हैं। वे दस्तावेज़ हमें याद दिलाते हैं कि एक समय ऐसा था जब हिंदू मंदिर मुगल बादशाहों के सहयोग से बने थे, और उन बादशाहों की नीति सब धर्मों के प्रति समान आदर की थी।
यह इतिहास हमारे आज के उन दिनों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है, जब हर चीज़ को धर्म के रंग में देखा जाता है। मुगलों का धर्मनिरपेक्ष मॉडल, जो किसी एक धर्म के झंडे के नीचे नहीं चलता था, बल्कि सबको साथ लेकर चलता था, यह दिखाता है कि धार्मिक बहुलता (pluralism) को राज्य का आधार बनाया जा सकता है। वृंदावन के मंदिर आज भी इसी संभावना के प्रतीक के रूप में खड़े हैं।
संदर्भ (स्रोत)
प्राथमिक स्रोत:
· अबुल फजल। अकबरनामा। एच. बेवरिज द्वारा अंग्रेजी अनुवाद। कलकत्ता: एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, 1907-1910।
· जहांगीर। अंकपाड़ के मंदिर के पुजारियों को 50 बीघा जमीन जारी रखने का फरमान, 16वां राज्य वर्ष (1621 ई.)। राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली। एक्सेस नंबर 92.16/9049।
द्वितीय स्रोत:
· हबीब, इरफान और तारापद मुखर्जी। ब्रजभूम इन मुगल टाइम्स: द स्टेट, पीजेंट्स एंड गोस्वामी। नई दिल्ली: प्राइमस बुक्स, 2020।
· फारूकी, मुनिस डी. ब्रजभूम इन मुगल टाइम्स की समीक्षा। जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, 21 फरवरी 2024।
· नसरीन, फरहत। “लेयर्स ऑफ हिस्ट्री डॉक्युमेंटेड।” द बुक रिव्यू, खंड 45, अंक 1, जनवरी 2021।
· मूसवी, शिरीन। एपिसोड्स इन द लाइफ ऑफ अकबर। नई दिल्ली: नेशनल बुक ट्रस्ट, 2005।
समाचार रिपोर्ट:
· “ऑफ अकबर्स रिलीजियस टॉलरेंस, एडमिनिस्ट्रेशन एंड रिलेवेंस,” एनडीटीवी, 15 अक्टूबर 2019।
· “औरंगज़ेब डोनेटेड ग्रांट्स टू टेंपल्स, क्लेम्स इलाहाबाद हिस्टोरियन,” द इकोनॉमिक टाइम्स, 13 सितंबर 2015।
सरकारी रिकॉर्ड:
· विशंभर नाथ पांडे। राज्यसभा में वक्तव्य। राज्यसभा वाद-विवाद, खंड 92, अंक 7, 27 जुलाई 1977।
सैयद अली नदीम रेज़ावी
